The Moral Question;
or, Duties to One’s Selves

मुझे बेहद खुशी है यह लिख पाने में कि हाल ही में मैंने एक दूसरी किताब लिखनी ख़त्म की है, ‘an essay, advancing a greater need of poetical consistency in one’s philosophy; in particular, by way of attempting to arrive at solutions to the problems of old age and domestic felicity, a clarification of one’s relations to, or the scope of one’s duties towards, those presently most pressingly resembling aspects of one’s world, namely one’s family and one’s nation’। कुछ और निजी कार्यों के अलावा, मैं इस पर- जिसे मैं ‘The Moral Question; or, Duties to One’s Selves‘ कहता रहा हूँ- पिछले फ़रवरी से काम कर रहा था, एक ऐसे सवाल के जवाब की खोज में डटा हुआ, जिसे मैंने बस छोड़ देना ठीक नहीं समझा। यह निबन्ध है, अपनी लम्बाई के बूते पर नहीं, जो कि आम तौर पर निबन्धों की जैसे होती है वैसी बिलकुल नहीं, पर, अगर ‘essay’ शब्द के शाब्दिक अर्थ पर ग़ौर फ़रमाया जाए, तो उसके एक प्रयत्न होने पर, विचारों को शब्द देने का- यहाँ संस्मरण और कॉमनप्लेइस किताबों के कहीं बीच की शैली में किया गया।

प्रस्तुत चित्र: कव्अ (The Moral Question; or, Duties to One’s Selves)
लेखक: अर्जुन जैन
भाषा: अङ्ग्रेज़ी
पन्ने: १११ (हाडबैक)
लम्बाई-चौड़ाई: १३.४ x १९.८ सॅ.मी.
क़ीमत: ₹२०० (डिजिटल छपाई, स्टिच-बाइण्डिङ्ग, हाडबैक कव्अ)
(पहली छपाई के वक़्त, सितम्बर २०१७)
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